मरती इंसानियत , हारता हिन्द

मैं भारत, देख रहा सब हूँ ,

मरते देख रहा हूँ , इंसानियत को मैं,

पनपते देख रहा हूँ , हैवानियत को मैं |

कल निर्भया थी , आज आशिफ़ा है |

कल तक हर गुनाह पर , मजहब बीच में ला रहे थे तुम ,

लो आज मजहब के नाम पे ही गुनाह कर आये तुम |

वाह इंसान ! देख रहा हूँ तुझ को मैं ,

पर देखते देखते मेरे , कब तू नफरत का ये ठेकेदार बना ,

नाम लेते लेते मेरा , कब मुझको ही भूला तु ,

सोच रहा हूँ , अब मैं यह |

~Sneha

P.c. google

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